सरकारी स्कूलों के कमजोर परिणामों का ठीकरा अक्सर शिक्षकों पर फोड़ा जाता है, लेकिन रतलाम जिले की ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की भारी कमी और अप्रत्याशित हालात के चलते बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। इन हालात में सिर्फ शिक्षकों को दोष देना नाइंसाफी है।
शिवपुर गांव: फिसलन भरे रास्तों से स्कूल पहुंचते हैं बच्चे
रतलाम जिले के शिवपुर गांव में स्थित शासकीय विद्यालय तक पहुंचना बच्चों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। बरसात में स्कूल का रास्ता कीचड़ और फिसलन से भर जाता है, जहां बच्चों को रोजाना जोखिम उठाकर स्कूल जाना पड़ता है। कई बार छात्र फिसलकर गिर भी जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मुद्दे पर अब तक कई बार शिकायतें की गई हैं, लेकिन न तो सड़क बनी और न ही बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम।
डोडियाना गांव: जर्जर भवन और जलभराव से परेशान शिक्षक व छात्र
जावरा तहसील के डोडियाना गांव की शासकीय प्राथमिक शाला की हालत और भी चिंताजनक है। स्कूल का भवन पूरी तरह से जर्जर हो चुका है और परिसर में भारी जलभराव की स्थिति बनी रहती है। यह गांव खुद जावरा तहसीलदार का है, इसके बावजूद समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अधिकारियों को इसकी जानकारी दी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यहां पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है और बारिश के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है।
जरूरी सवाल: क्या सिर्फ शिक्षक ही जिम्मेदार हैं?
शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए शिक्षकों की जवाबदेही ज़रूरी है, लेकिन जब स्कूलों की भौतिक स्थिति ही खराब हो, तो पढ़ाई कैसे बेहतर होगी? यदि सरकार वास्तव में सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन को सुधारना चाहती है, तो उसे इन्फ्रास्ट्रक्चर, संसाधन और सुरक्षा जैसे पहलुओं पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा।


