Independence Day 2025 Special: आज़ादी के 79 साल पूरे होने पर हम आपको मध्य प्रदेश के रतलाम जिले की पिपलौदा रियासत की अनकही कहानी बता रहे हैं — एक ऐसी रियासत जो पूरे देश के साथ 15 अगस्त 1947 को आज़ाद नहीं हुई, बल्कि 20 मई 1948 को भारत में विलय हुई। इस विलय के पीछे तीव्र जनसंघर्ष, गोलियों की बौछार और कई लोगों की शहादत की कहानी छिपी है।
क्यों हुई आज़ादी में देरी
स्वतंत्रता से पहले भारत में 562 रियासतें थीं। आज़ादी के बाद सरदार पटेल के प्रयासों से अधिकांश ने भारत में विलय कर लिया, लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर और कुछ अन्य रियासतों में विलय में देरी हुई। पिपलौदा भी उन्हीं में से एक था।
1936 में राजा मंगलसिंह की मृत्यु के बाद नाबालिग वारिस रघुनाथ सिंह के कारण यहां अंग्रेजों का माइनारिटी एडमिनिस्ट्रेशन लागू था। एक अधीक्षक इंदौर के पॉलिटिकल एजेंट के अधीन शासन चला रहा था। आज़ादी के बाद राजमाता केशवकुमारी को अधिकार मिले, लेकिन विलय में देरी से जनआक्रोश भड़क उठा।

समानांतर सरकार और जनसंघर्ष
1946 में पिपलौदा राज्य कांग्रेस बनी। प्रवीण सिंह अध्यक्ष और नाथूसिंह राव उपाध्यक्ष बने। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने लोकतांत्रिक शासन की मांग तेज कर दी। देशी राज्य लोक परिषद के अध्यक्ष सैय्यद हामिद अली और सरदार पटेल ने भी समर्थन दिया। वी.पी. मेनन की सलाह पर अहिंसक आंदोलन जारी रहा, लेकिन राजमहल ने टालमटोल की नीति अपनाई।
20 मई 1948: गोलियों की गूंज और विलय
20 मई 1948 को जनआंदोलन ने जोर पकड़ा। थानेदार प्रताप सिंह और दीवान सुगनचंद को जनता ने बंदी बना लिया। केसर विलास महल से 82 गोलियां चलाई गईं, जिसमें अफरा-तफरी मच गई। सीआरपीएफ बुलानी पड़ी। संघर्ष में दो जवान शहीद हुए और कई लोग घायल हुए। आखिरकार, गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप से प्रशासन ने राजमाता से शासन छीनकर भारत सरकार के हवाले कर दिया। समानांतर सरकार ने भी अपना कार्यभार सौंप दिया और पिपलौदा का भारत में विलय हो गया।
आज़ादी से अब तक का बदलाव
आंदोलन के साक्षी 96 वर्षीय बलभद्र सिंह राव कहते हैं — “तब लोग कर्तव्य की बात करते थे, अब अधिकार की। देशभक्ति अब बस 15 अगस्त, 26 जनवरी और पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों में नज़र आती है।”


