भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में OBC वर्ग (Other Backward Classes) सबसे बड़ा वोट बैंक माना जाता है। आबादी का 50% से अधिक हिस्सा होने के बावजूद इस वर्ग को जिलों में नेतृत्व देने में अब भी दोनों बड़ी पार्टियाँ – भाजपा और कांग्रेस – पीछे नजर आ रही हैं। हालांकि, हाल में घोषित जिला अध्यक्षों की सूची में भाजपा ने कांग्रेस की तुलना में OBC नेताओं को अधिक मौका दिया है और महिला नेतृत्व में भी बढ़त बनाई है।
कांग्रेस की नई सूची पर सवाल
कांग्रेस ने हाल ही में 71 शहरी और ग्रामीण जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों का ऐलान किया। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इनमें करीब 12 से 14 OBC नेताओं को जगह दी गई है। पार्टी नेताओं का दावा है कि यह संख्या बढ़कर 25 तक हो सकती है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट सूची सामने नहीं आई है। इसके अलावा, कांग्रेस ने 10 एसटी, 8 एससी, 3 अल्पसंख्यक और सिर्फ 4 महिलाओं को जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है।
भाजपा ने दिया ज्यादा प्रतिनिधित्व
दूसरी तरफ भाजपा ने अपने 62 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में लगभग 40% पद OBC नेताओं को दिए हैं। सूची के अनुसार, भाजपा ने 25 OBC, 30 सामान्य वर्ग (16 ब्राह्मण, 6 राजपूत, 8 वैश्य), 4 एसटी और 3 एससी नेताओं को जिला अध्यक्ष बनाया है। खास बात यह है कि भाजपा ने 7 महिलाओं को भी जिम्मेदारी सौंपी, जो कांग्रेस से लगभग दोगुनी है।
आधी आबादी को अधूरा नेतृत्व
विशेषज्ञ मानते हैं कि OBC वर्ग और महिलाएँ, दोनों ही राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बावजूद इसके, जिला अध्यक्षों की सूची में इन वर्गों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही लगातार OBC समुदाय को साधने का दावा करती हैं, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर दोनों दलों का संतुलन अभी भी अधूरा है।

OBC की राजनीतिक अहमियत
मध्य प्रदेश की राजनीति में पिछले दो दशकों से OBC नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भाजपा ने वर्ष 2003 से अब तक उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और अब डॉ. मोहन यादव जैसे OBC नेताओं को मुख्यमंत्री बनाकर यह संदेश दिया है कि पार्टी इस वर्ग को प्राथमिकता देती है।
कांग्रेस भी अपने संगठन में ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के नेताओं को शामिल करने का दावा करती है, लेकिन हाल की नियुक्तियाँ सवाल खड़े कर रही हैं।
आरक्षण पर भी जारी है बहस
राज्य में OBC की आबादी 50% से ज्यादा है। इसके बावजूद सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण देने का दावा फिलहाल कोर्ट में लंबित है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ओबीसी प्रतिनिधित्व और महिला नेतृत्व का मुद्दा आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बड़ा फैक्टर बन सकता है।


