सागर विश्वविद्यालय (Dr. Harisingh Gour University) में सहायक प्रोफेसरों की नियुक्तियों में गंभीर गड़बड़ी सामने आई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा अवैधानिक तरीके से 82 असिस्टेंट प्रोफेसर को स्थायी नियुक्ति देने के आदेश को निरस्त करते हुए ₹5 लाख का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि यह राशि कार्यपरिषद के प्रत्येक सदस्य से वसूली जा सकती है।
मामला कैसे शुरू हुआ
यह मामला सागर निवासी डॉ. दीपक गुप्ता की याचिका से जुड़ा है। याचिका में कहा गया कि 2010 में जारी भर्ती विज्ञापन में न तो पदों की संख्या बताई गई और न ही विषयों का उल्लेख था। बाद में जारी शुद्धिपत्र में 76 पदों का विज्ञापन किया गया, लेकिन विषय अब भी स्पष्ट नहीं किए गए। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने मनमाने तरीके से 156 पदों पर नियुक्तियां कर दीं।
2017 में हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को अवैधानिक करार देकर पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद फरवरी 2020 में कार्यपरिषद ने नई सूची बनाने का फैसला किया।
2022 का विवादास्पद निर्णय
14 नवंबर 2022 को कार्यपरिषद ने अपने ही पुराने निर्णय को बदलते हुए कहा कि 156 में से 82 असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं, इसलिए उन्हें स्थायी नियुक्ति दे दी जाए। याचिकाकर्ता ने इस कदम को योग्यता के विरुद्ध और अयोग्य व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने वाला बताया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और आदेश
सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने पाया कि नियुक्तियां वैधानिक प्रक्रिया के बिना की गईं। कोर्ट ने 7 फरवरी 2020 के निर्णय के तहत तीन माह के भीतर नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि तय समय में नई नियुक्तियां नहीं हुईं, तो 14 नवंबर 2022 के आदेश के तहत नियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसर 15 नवंबर 2025 से कार्यरत नहीं माने जाएंगे।
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जुर्माने की राशि का बंटवारा
₹5 लाख के जुर्माने में से:
- ₹2 लाख — मप्र पुलिस कल्याण कोष
- ₹1 लाख — नेशनल डिफेंस फंड
- ₹1 लाख — आर्म्ड फोर्सेज फ्लैग डे फंड
- ₹50,000 — मप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
- ₹50,000 — हाईकोर्ट बार एसोसिएशन
राशि को 45 दिनों के भीतर जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।


