भोपाल न्यूज़ – मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अभियुक्त का आपराधिक अतीत मात्र उसे दोषसिद्ध करने का आधार नहीं हो सकता। आर्म्स एक्ट के एक मामले में जिला न्यायालय और एडीजे कोर्ट द्वारा सुनाई गई एक साल की सजा को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को रिहा करने के आदेश जारी किए।
मामले की पृष्ठभूमि
- भोपाल निवासी करिया कंजर को जिला न्यायालय ने आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत दोषी ठहराते हुए एक साल की सजा सुनाई थी।
- इस फैसले को एडीजे कोर्ट ने भी 18 जुलाई 2025 को बरकरार रखा था।
- आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनः निरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें गवाहों के बयान बदलने और विवेचना में गंभीर खामियों की ओर ध्यान दिलाया गया।
याचिका में प्रमुख तर्क
- स्वतंत्र गवाहों ने अदालत में बयान दिया कि पुलिस ने उनसे केवल हस्ताक्षर करवाए, जबकि उन्होंने आरोपी के पास से कट्टा और कारतूस जब्त होते नहीं देखा।
- विवेचना अधिकारी के साथ मौजूद पुलिसकर्मी भी गवाही देने कोर्ट में पेश नहीं हुए।
- जब्तगी और सीजिंग को लेकर गवाहों ने परस्पर विरोधी बयान दिए।

हाईकोर्ट का निर्णय
जस्टिस राम कुमार चौबे की एकलपीठ ने कहा:
- केवल आरोपी का आपराधिक चरित्र या अतीत दोषसिद्धि का आधार नहीं हो सकता।
- पुलिस रिकॉर्ड में आरोपी के खिलाफ सात आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात कही गई, लेकिन किसी में भी सजा का ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया।
- गवाहों के विरोधाभासी बयानों और विवेचना की कमियों को देखते हुए अदालत ने सजा निरस्त कर दी।


