मध्य प्रदेश में मातृ स्वास्थ्य को लेकर हाल ही में जारी विशेष बुलेटिन ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है। भारत सरकार के “मातृ मृत्यु दर बुलेटिन 2020-22” के अनुसार, मध्य प्रदेश की मातृ मृत्यु दर (MMR) 173 से घटकर 159 पर आ गई है। लेकिन यह गिरावट राहत से ज़्यादा चेतावनी जैसी है।
🔴 अब भी सबसे अधिक मातृ मृत्यु दर वाला राज्य
जहां पूरे भारत की औसत मातृ मृत्यु दर 88 है, वहीं मध्य प्रदेश में 159 का आंकड़ा इसे देश का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य बना रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में हर एक लाख प्रसव पर 159 महिलाओं की मौत होती है। यह स्थिति बेहद गंभीर है और साफ संकेत देती है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं माताओं को सुरक्षित रखने में विफल हो रही हैं।
मुख्य समस्याएं क्या है
विशेषज्ञों का मानना है कि एमपी में मातृ स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कई बड़े कारण हैं:
- अपर्याप्त गर्भावस्था पूर्व देखभाल सेवाएं
- संस्थागत प्रसव की कमी (अर्थात अस्पताल में सुरक्षित डिलीवरी नहीं होना)
- आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की कमी
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के मुताबिक, मध्य प्रदेश में मातृ मृत्यु दर के साथ-साथ 14 की मृत्यु दर और 0.47% जीवनकाल जोखिम भी दर्ज हुआ है। ये आंकड़े देशभर में सबसे ज़्यादा हैं।

🗣️ जान स्वास्थ्य अभियान का क्या कहना है?
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) से जुड़े प्रतिनिधि अमुल्य निधि का कहना है कि –
“मध्य प्रदेश में माताओं की जान जाना एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है। यह सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की कमी नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीर खामियों को उजागर करता है।”
वे कहते हैं कि गंभीर रूप से पारदर्शी मातृ मृत्यु ऑडिट (जांच) की आवश्यकता है, ताकि हर मौत के पीछे की असली वजह सामने आ सके।
✅ समाधान क्या हो सकते हैं?
मध्य प्रदेश को अन्य राज्यों से सीख लेकर तुरंत असरदार कदम उठाने होंगे, जैसे:
- बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का निर्माण
- हर क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं तक सुविधाओं की पहुँच सुनिश्चित करना
- सस्ती और सुलभ इलाज व्यवस्था
- समाज में जागरूकता अभियान चलाना, जिससे महिलाएं समय पर अस्पताल जाएं
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुधार और निगरानी प्रणाली मजबूत करना


