उज्जैन। महाकाल मंदिर गर्भगृह में वीआईपी के साथ आम भक्तों को भी प्रवेश देने को लेकर दायर जनहित याचिका पर इंदौर हाईकोर्ट ने सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला तब तूल पकड़ा जब 21 जुलाई को इंदौर विधायक गोलू शुक्ला और उनके बेटे रुद्राक्ष शुक्ला के कथित गर्भगृह प्रवेश का वीडियो वायरल हुआ।
याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी ने अपनी याचिका में कहा कि महाकाल मंदिर में रोजाना देशभर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन उन्हें लंबी कतारों में घंटों खड़े रहना पड़ता है। वहीं, नेताओं, अफसरों और वीआईपी मेहमानों को गर्भगृह तक सीधे प्रवेश दिया जाता है। सुरक्षाकर्मियों का रवैया ऐसा है कि आम भक्तों को कुछ देर भी रुकने नहीं दिया जाता, जबकि वीआईपी आराम से पूजा-अर्चना कर लेते हैं।
अवस्थी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि मंदिर में दर्शन की कोई अलग व्यवस्था तय नहीं है, लेकिन “वीआईपी कल्चर” के नाम पर आम भक्तों को व्यवस्थित दर्शन का अधिकार नहीं मिल पाता। कई बार तो आम भक्तों की एंट्री ही रोक दी जाती है। सवाल उठाया गया कि क्या गर्भगृह केवल वीआईपी नेताओं और अफसरों के लिए ही आरक्षित है?
हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद प्रदेश सरकार, महाकाल मंदिर प्रशासक, उज्जैन कलेक्टर और अन्य पक्षकारों की दलीलें सुनीं और अब इस पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
मंदिरों में वीआईपी संस्कृति
भारतीय लोकतंत्र में जहाँ “सभी नागरिक समान” होने की बात किताबों तक सीमित है, वहीं मंदिरों में भी यह असमानता साफ झलकती है। आम भक्तों को भगवान तक पहुँचने के लिए पसीना बहाना पड़ता है, मगर वीआईपी के लिए भगवान भी मानो ‘अपॉइंटमेंट स्लॉट’ खाली रखे बैठे हों। दरअसल, देवता से ज्यादा पुजारी और सुरक्षाकर्मी वीआईपी की सेवा में व्यस्त दिखते हैं। आम भक्त सोचता रह जाता है कि क्या भगवान सचमुच सबके हैं या फिर उनके भी विशेष ‘वीआईपी दर्शन पैकेज’ होते हैं।


