मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में एक अहम संगठनात्मक बदलाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। पार्टी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नए चेहरे का ऐलान जुलाई के पहले सप्ताह में कर सकती है। हैरान कर देने वाली बात ये है कि इस बार भाजपा किसी आदिवासी या महिला नेता को संगठन की कमान सौंप सकती है। पार्टी का उद्देश्य है — सामाजिक संतुलन के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी देना, जो 2028 की दिशा तय कर सकता है।
भाजपा के सूत्रों की मानें तो प्रदेश अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया 1 जुलाई से शुरू हो सकती है और 3 जुलाई तक नाम को अंतिम रूप देने की पूरी संभावना है। संगठनात्मक प्रक्रिया को देखने के लिए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को चुनाव अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया है, जो एक-दो जुलाई को भोपाल पहुंच सकते हैं।
यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले के बाद संगठन चुनाव की प्रक्रिया कुछ समय के लिए स्थगित की गई थी। लेकिन अब दोबारा से चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और महाराष्ट्र समेत तीन राज्यों में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव अधिकारी भी तय हो चुके हैं।
राज्य में वर्तमान में संगठन की जो संरचना है, वह इस प्रकार है —
- मुख्यमंत्री ओबीसी वर्ग से
- उपमुख्यमंत्री अनुसूचित जाति वर्ग से
- वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सामान्य वर्ग से
ऐसे में अब पार्टी का फोकस नए अध्यक्ष के चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व और संतुलन बनाने पर है, जिससे सभी वर्गों को पार्टी से जोड़ने का स्पष्ट संदेश दिया जा सके।

जानिए कौन हैं प्रमुख दावेदार? महिला और आदिवासी चेहरे की संभावना क्यों है प्रबल?
इस बार भाजपा का शीर्ष नेतृत्व “नए नेतृत्व समीकरण” के तहत काम कर रहा है। सूत्रों की मानें तो पार्टी नेतृत्व ने साफ इशारा दिया है कि केवल अनुभव ही नहीं, सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा।
मौजूदा दावेदारों की सूची में शामिल नाम:
- वी.डी. शर्मा (वर्तमान अध्यक्ष — दोबारा मौका मिल सकता है)
- डॉ. नरोत्तम मिश्रा (पूर्व मंत्री)
- राजेन्द्र शुक्ला (डिप्टी सीएम)
- अरविंद भदौरिया (पूर्व मंत्री)
- हेमंत खंडेलवाल (बैतूल विधायक)
- सुधीर गुप्ता (मंदसौर सांसद)
हालांकि, पार्टी के अंदरखाने की माने तो यदि महिला नेता को मौका दिया जाता है, तो ये नाम प्रमुख हो सकते हैं:
- अर्चना चिटनीस (पूर्व मंत्री, जमीनी पकड़)
- कविता पाटीदार (राज्यसभा सांसद, तेज-तर्रार छवि)
- लता वानखेड़े (मूल रूप से संगठन से जुड़ी महिला नेता)
- सावित्री ठाकुर (आदिवासी और महिला दोनों वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं)
यदि पार्टी आदिवासी वर्ग को नेतृत्व में लाना चाहती है, तो इन नामों पर गंभीरता से विचार हो रहा है:
- दुर्गादास उइके (केंद्रीय मंत्री, बैतूल से सांसद)
- गजेन्द्र पटेल (खरगोन सांसद)
- फग्गन सिंह कुलस्ते (अनुभवी आदिवासी चेहरा)
- सुमेर सिंह सोलंकी (राज्यसभा सांसद)
वहीं, अगर पार्टी अनुसूचित जाति वर्ग से नेतृत्व तय करना चाहे, तो लाल सिंह आर्य (अजा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष) और प्रदीप लारिया (विधायक) जैसे नामों की चर्चा है।
भाजपा पूर्व में द्रौपदी मुर्मु को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी समाज को सम्मान देने का संकेत दे चुकी है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां आदिवासी वोट बैंक निर्णायक है, पार्टी इसी रणनीति को आगे बढ़ा सकती है।
चुनाव प्रक्रिया कैसी होगी? प्रदेश परिषद और पिछली परंपराओं पर एक नजर
भाजपा संगठन की परंपरा के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव आमतौर पर सर्वसम्मति से होता है। मध्यप्रदेश भाजपा में अब तक केवल दो बार ही ऐसा हुआ है जब मतदान की नौबत आई।
- पहली बार 1990 के दशक में लखीराम अग्रवाल बनाम कैलाश जोशी
- दूसरी बार 2000 में शिवराज सिंह चौहान बनाम विक्रम वर्मा, जिसमें विक्रम वर्मा विजयी रहे।
इस बार चुनाव प्रक्रिया के लिए पार्टी ने पहले से प्रदेश परिषद के 345 सदस्य चुन लिए हैं। दो विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर एक क्लस्टर बनाया गया है, और उसी आधार पर परिषद सदस्य चुने गए हैं। आरक्षित वर्गों को बराबर प्रतिनिधित्व मिला है और महिलाओं व ओबीसी वर्ग को भी उचित भागीदारी दी गई है।
चुनाव की पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के साथ संचालित होगी और उम्मीद की जा रही है कि यह बदलाव पार्टी के भीतर ऊर्जा और संतुलन का नया अध्याय शुरू करेगा।
बदलाव के इस मोड़ पर भाजपा का अगला कदम क्या संकेत देगा?
मध्यप्रदेश भाजपा के लिए यह क्षण केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2028 की रणनीति की नींव भी साबित हो सकता है।
क्या भाजपा आदिवासी कार्ड खेलेगी?
या फिर महिला नेतृत्व के सहारे नए वोट बैंक को साधेगी?
जो भी हो, पार्टी का यह कदम न केवल अंदरूनी समीकरणों को बदलेगा, बल्कि पूरे राज्य की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालेगा।
अब सबकी निगाहें 3 जुलाई पर टिकी हैं — क्या आपको लगता है यह फैसला भाजपा को नई दिशा देगा?


